सहसतनेत्रप्रतिमानकर्मण: सहस्रपत्रप्रतिमाननं शुभम् | सहसरश्मिर्दिनसंक्षये यथा तथापतत् कर्णशिरो वसुंधराम्,सहसनेत्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी कर्णका सहस्रदल कमलके समान वह सुन्दर मस्तक उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे सायंकालमें सहस्र किरणोंवाले सूर्यका मण्डल अस्त हो जाता है
sahasranetra-pratimāna-karmaṇaḥ sahasra-patra-pratimānanaṃ śubham | sahasra-raśmir dina-saṃkṣaye yathā tathāpatat karṇa-śiro vasuṃdharām ||
संजय बोले— सहस्रनेत्रधारी इन्द्र के समान पराक्रम वाले कर्ण का, सहस्रदल कमल के समान शोभायमान मुख वाला वह उत्तम मस्तक, उसी प्रकार पृथ्वी पर गिर पड़ा जैसे दिन के अंत में सहस्र किरणों वाला सूर्य-मण्डल अस्त हो जाता है।
संजय उवाच