तथैव कृष्णश्न धनंजयश्न हृष्टो यमौ दश्मतुर्वारिजातौ । त॑ सोमकाः प्रेक्ष्य हतं शयानं सैन्यै: सार्थ सिंहनादान् प्रचक्रु:
tathaiva kṛṣṇaś ca dhanañjayaś ca hṛṣṭau yamau daśmatuḥ vārijātau | taṃ somakāḥ prekṣya hataṃ śayānaṃ sainyaiḥ sārtha siṃhanādān pracakruḥ ||
उसी प्रकार कृष्ण और धनञ्जय (अर्जुन) हर्षित हुए, और माद्री के दोनों पुत्रों (नकुल-सहदेव) ने अपने कमल-सदृश हाथों से ताली बजाई। उस शत्रु को मरा हुआ पड़ा देखकर सोमक और उनकी सेना ने सिंहनाद किया।
संजय उवाच