ततस्तदस्त्रं मनस: प्रणष्टं यद् भार्गवो<स्मै प्रददौ महात्मा । चक्र च वाम॑ ग्रसते भूमिरस्य प्राप्ते तस्मिन् वधकाले नूवीर,नरवीर! अब कर्णके वधका समय आ पहुँचा था। महात्मा परशुरामने कर्णको जो भार्गवास्त्र प्रदान किया था, वह उस समय उसके मनसे निकल गया--उसे उसकी याद न रह सकी। साथ ही, पृथ्वी उसके रथके बायें पहियेको निगलने लगी
tatas tad astraṁ manasaḥ praṇaṣṭaṁ yad bhārgavo 'smai pradadau mahātmā | cakraṁ ca vāmaṁ grasate bhūmir asya prāpte tasmin vadhakāle nū ||
संजय बोले—हे नरवीर! तब महात्मा भार्गव परशुराम ने कर्ण को जो अस्त्र प्रदान किया था, वह उसी क्षण उसके मन से लुप्त हो गया; उसे उसका स्मरण न रहा। और जब उसके वध का नियत समय आ पहुँचा, तब पृथ्वी उसके रथ के बाएँ पहिये को निगलने लगी।
संजय उवाच