तदनन्तर कर्ण (सावधान होकर) शत्रुओंपर बहुत-से बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा। उस समय जैसे अस्ताचलकी ओर जाते हुए सूर्यमण्डल और उसकी किरणें लाल हो जाती हैं, उसी प्रकार खूनसे लाल हुआ वह शरसमूहरूपी किरणोंसे सुशोभित हो रहा था ।। बाह्नन्तरादाधिर थेरविंमुक्तान् बाणान् महाहीनिव दीप्यमानान् | व्यध्वंसयन्नर्जुनबाहुमुक्ता: शरा: समासाद्य दिश: शिताग्रा:
tadanantaraṁ karṇaḥ sāvadhānaḥ śatrūn prati bahūn bāṇasaṁghān varṣayām āsa | tasmin kāle yathā astācalam abhigacchataḥ sūryamaṇḍalasya raśmayaś ca lohitā bhavanti, tathā rudhireṇa lohitaḥ sa śarasaṁgho raśmivat śobhām avāpa || bāhvantareṇādhirathena vimuktān bāṇān mahāhīn iva dīpyamānān | vyadhvaṁsayann arjunabāhumuktāḥ śarāḥ samāsādya diśaḥ śitāgrāḥ ||
संजय बोले—तदनन्तर कर्ण सावधान होकर शत्रुओं पर घने बाणसमूहों की वर्षा करने लगा। उस समय जैसे अस्ताचल की ओर जाते हुए सूर्य-मण्डल और उसकी किरणें लाल हो उठती हैं, वैसे ही रक्त से रँगा हुआ वह शरसमूह किरणों के गुच्छे-सा दीप्तिमान् होकर शोभित होने लगा। अधिरथपुत्र कर्ण की भुजाओं के बीच से छूटे, महान् सर्पों के समान प्रज्वलित बाण, अर्जुन की भुजाओं से निकले तीक्ष्ण शरों से टकराकर, सब दिशाओं में फैलते हुए उन्हें चूर-चूर करने लगे।
संजय उवाच