उस महासमरमें अर्जुन कुपित होकर कर्णके वधके लिये जिस-जिस अस्त्रका वेगपूर्वक प्रयोग करते थे, उसे आकाशमें ही कर्ण अपने भयंकर बाणोंद्वारा काट देता था ।। उदीर्यमाणं सम कुरून् दहन्तं सुवर्णपुड्खैर्विशिखैरममर्द । कर्णस्त्वमोघेष्वसनं दृढज्यं विस्फारयित्वा विसृजज्छरौघान्,कर्णका धनुष अमोघ था। उसकी डोरी भी बहुत मजबूत थी। वह अपने धनुषको खींचकर उसके द्वारा बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा। कौरव-सेनाको दग्ध करनेवाले अर्जुनके छोड़े हुए अस्त्रको उसने सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा धूलमें मिला दिया
sañjaya uvāca |
usa mahāsamare 'rjunaḥ kupitaḥ karṇasya vadhāya yān yān astrān vegapūrvakaṃ prayuṅkte sma, tān tān ākāśa eva karṇaḥ svair bhīṣaṇaiḥ bāṇaiś chittvā nāśayati sma ||
udīryamāṇaṃ samare kurūn dahantaṃ suvarṇapuṅkhair viśikhair amamarda |
karṇas tv amogheṣv asanaṃ dṛḍhajyaṃ visphārayitvā visṛjaj charaughān ||
संजय बोले—उस महासमर में अर्जुन क्रोध से भरकर कर्ण के वध के लिए अनेक अस्त्रों को बड़े वेग से चलाता रहा; पर कर्ण अपने भयानक बाणों से उन्हें आकाश में ही काटकर गिरा देता था। फिर अमोघ और दृढ़-डोरी वाले धनुष को खींचकर कर्ण ने शरों की घनघोर वर्षा कर दी। कौरवों को दग्ध करने वाले अर्जुन के प्रज्वलित अस्त्र को उसने सुवर्ण-पंख वाले बाणों से कुचलकर धूल में मिला दिया।
संजय उवाच