कपिश्रेष्ठस्तु पार्थस्य व्यादितास्य इवान्तक: । दंष्टाभिर्भीषयन् भाभिद्दुर्निरी क्ष्यो रविर्यथा,कुन्तीकुमार अर्जुनके रथपर मुँह बाये हुए यमराजके समान एक श्रेष्ठ वानर बैठा हुआ था, जो अपनी दाढ़ोंसे सबको डराया करता था। वह अपनी प्रभासे सूर्यके समान जान पड़ता था। उसकी ओर देखना कठिन था
kapiśreṣṭhas tu pārthasya vyāditāsya ivāntakaḥ | daṃṣṭrābhir bhīṣayan bhābhid durnirīkṣyo ravir yathā ||
संजय बोले—कुन्तीपुत्र अर्जुन के रथ पर श्रेष्ठ वानर बैठा था, जो मुँह बाए हुए यमराज के समान था और अपनी दाढ़ों से सबको भयभीत करता था। वह अपनी प्रभा से सूर्य के समान जान पड़ता था; उसकी ओर देखना कठिन था॥
संजय उवाच