देवास्तु पितृभि: सार्थ सगणा: सपदानुगा: । यमो वैश्रवणश्वैव वरुणश्न यतो<र्जुन:
devās tu pitṛbhiḥ sārthaṃ sagaṇāḥ sapadānugāḥ | yamo vaiśravaṇaś caiva varuṇaś ca yato 'rjunaḥ ||
संजय बोले—देवता पितरों के साथ, अपने-अपने गणों और अनुचरों सहित, तथा यम, वैश्रवण (कुबेर) और वरुण—ये सब वहीं उपस्थित थे, जहाँ अर्जुन खड़ा था।
संजय उवाच