इसी प्रकार शल्यने भी कमलनयन श्रीकृष्णकी ओर दृष्टिपात किया; परंतु वहाँ विजय श्रीकृष्णकी ही हुई। उन्होंने अपने नेत्ररूपी बाणोंसे शल्यको पराजित कर दिया ।। कर्ण चाप्यजयद् दृष्ट्या कुन्तीपुत्रो धनंजय: । अथाब्रवीत् सूतपुत्र: शल्यमाभाष्य सस्मितम्,इसी तरह कुन्तीनन्दन धनंजयने भी अपनी दृष्टिद्वारा कर्णको परास्त कर दिया। तदनन्तर कर्णने शल्यसे मुसकराते हुए कहा--'शल्य! सच बताओ, यदि कदाचित् आज रणभूमिमें कुन्तीपुत्र अर्जुन मुझे यहाँ मार डालें तो तुम इस संग्राममें क्या करोगे?”
tathā śalyenāpi kamalanayanaṃ śrīkṛṣṇaṃ prati dṛṣṭipātaḥ kṛtaḥ; kintu tatra jayaḥ śrīkṛṣṇasyaiva babhūva. sa netra-śaraireva śalyaṃ parājigāya. karṇaṃ cāpy ajayad dṛṣṭyā kuntīputro dhanañjayaḥ. athābravīt sūtaputraḥ śalyam ābhāṣya sasmitaṃ— “śalya, satyaṃ vada; yadi kadācit adya raṇabhūmau kuntīputro ’rjunaḥ mām iha hanyāt, tvaṃ asmin saṃgrāme kiṃ kariṣyasi?”
संजय बोले—इसी प्रकार शल्य ने भी कमलनयन श्रीकृष्ण की ओर दृष्टि डाली; पर वहाँ विजय श्रीकृष्ण की ही हुई—उन्होंने नेत्ररूपी बाणों से शल्य को जीत लिया। उसी तरह कुन्तीपुत्र धनंजय ने भी अपनी दृष्टि से कर्ण को परास्त किया। तब सूतपुत्र कर्ण ने मुसकराते हुए शल्य से कहा—“शल्य! सच बताओ, यदि आज रणभूमि में कुन्तीपुत्र अर्जुन मुझे यहाँ मार डाले, तो तुम इस संग्राम में क्या करोगे?”
संजय उवाच