दुर्योधन द्रौणिमुखांश्व॒ सर्वा- नहं रणे वृषसेनं तमुग्रम् । सम्पश्यत: कर्ण तवाद्य संख्ये नयामि लोकं निशितै: पृषत्कै:
sañjaya uvāca |
duryodhana drauṇimukhāṁś ca sarvān ahaṁ raṇe vṛṣasenaṁ tam ugram |
sampaśyataḥ karṇa tavādya saṅkhye nayāmi lokaṁ niśitaiḥ pṛṣatkaiḥ ||
संजय बोले—“हे कर्ण! आज संग्राम में तुम्हारे देखते-देखते मैं उस उग्र वृषसेन को और द्रोणिपुत्र अश्वत्थामा आदि समस्त प्रमुख योद्धाओं को अपने तीखे बाणों से यमलोक पहुँचा दूँगा।”
संजय उवाच