एवं क्रुद्धो भीमसेन: करेण उत्पाटयामास भुजं महात्मा | दुःशासनं तेन स वीरमध्ये जघान वज्राशनिसंनिभेन,युद्धस्थलमें ऐसी बात कहते हुए राजकुमार दुःशासनकी छातीपर चढ़कर भीमसेनने उसे दोनों हाथोंसे बलपूर्वक पकड़ लिया और उच्च स्वरसे सिंहनाद करते हुए समस्त योद्धाओंसे कहा--“आज दुःशासनकी बाँह उखाड़ी जा रही है। यह अब अपने प्राणोंको त्यागना ही चाहता है। जिसमें बल हो, वह आकर इसे मेरे हाथसे बचा ले।” इस प्रकार समस्त योद्धाओंको ललकारकर महाबली, महामनस्वी, कुपित भीमसेनने एक ही हाथसे वेगपूर्वक दुःशासनकी बाँह उखाड़ ली। उसकी वह बाँह वज़्के समान कठोर थी। भीमसेन समस्त वीरोंके बीच उसीके द्वारा उसे पीटने लगे
evaṁ kruddho bhīmasenaḥ kareṇotpāṭayāmāsa bhujaṁ mahātmā | duḥśāsanaṁ tena sa vīramadhye jaghāna vajrāśanisaṁnibhena ||
Sañjaya said: Enraged, the great-souled Bhīmasena tore out Duḥśāsana’s arm with his hand. Then, in the midst of the warriors, he struck Duḥśāsana with that arm, which was like a thunderbolt—an act of ferocious retribution in the brutal ethics of battlefield vengeance, where wrath and remembered humiliation erupt into bodily punishment.
संजय उवाच