मनोरथो यस्तु ममाद्य तस्य मद्रेश युद्ध प्रति पाण्डवस्य । नैतच्चिरादाशु भविष्यतीद- मत्यद्भुतं चित्रमतुल्यरूपम्
manoratho yas tu mamādya tasya madreśa yuddha prati pāṇḍavasya | naitac cirād āśu bhaviṣyatīdam atyadbhutaṃ citram atulyarūpam ||
हे मद्रराज! आज पाण्डव के विरुद्ध युद्ध के विषय में जो मनोरथ मेरे मन में है, वह अधिक काल तक अधूरा नहीं रहेगा। शीघ्र ही यह घटित होगा—अत्यन्त अद्भुत, विचित्र और अनुपम रूप वाला कर्म।
कर्ण उवाच