विरथान् द्रौपदेयांकश्ष चकार भरतर्षभ । अदक्ष्णो्निमिषमात्रेण तदद्भुतमिवाभवत्
भरतश्रेष्ठ! शत्रुओं को संताप देने वाले कर्ण ने पलक झपकते ही द्रौपदी-पुत्रों को रथहीन कर दिया; और तीन बाणों से सहदेव के सारथि को भी मार गिराया—वह कार्य अद्भुत-सा प्रतीत हुआ।
संजय उवाच