विदार्य नागाश्वरथान् धनंजय: शरोत्तमैर्वांसववज्ञसंनिभै: । द्रुतं ययौ कर्णजिघांसया तथा यथा मरुत्वान् बलभेदने पुरा,जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने बलासुरका विनाश करनेके लिये बड़े वेगसे यात्रा की थी, उसी प्रकार अर्जुन कर्णको मार डालनेकी इच्छासे इन्द्रके वज्जसदृश उत्तम बाणोंद्वारा शत्रुओंके हाथी, घोड़ों और रथोंको विदीर्ण करते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े
sañjaya uvāca | vidārya nāgāśvarathān dhanañjayaḥ śarottamair vāṃsavavajñasaṃnibhaiḥ | drutaṃ yayau karṇajighāṃsayā tathā yathā marutvān balabhedane purā ||
संजय बोले—इन्द्र के वज्र के समान प्रभावशाली उत्तम बाणों से शत्रुओं के हाथी, घोड़े और रथों को विदीर्ण करता हुआ धनंजय, कर्ण-वध की अभिलाषा से शीघ्र आगे बढ़ा—जैसे प्राचीन काल में मरुत्वान् इन्द्र बलासुर के विनाश हेतु वेग से चला था।
संजय उवाच