तेजसा वह्लिसदृशो वायुवेगसमो जवे । अन्तकप्रतिम: क्रोधे सिंहसंहननो बली,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” कर्ण तेजमें अग्निके सदृश, वेगमें वायुके समान, क्रोधमें यमराजके तुल्य, सुदृढ़ शरीरमें सिंहके सदृश तथा बलवान् है
sañjaya uvāca | tejasā vahlisadṛśo vāyuvegāsamo jave | antakapratimaḥ krodhe siṃhasaṃhanano balī | prayāhi śīghraṃ govinda sūtaputrajighāṃsayā |
कर्ण तेज में अग्नि के समान, वेग में वायु के तुल्य, क्रोध में अन्तक के सदृश, सिंह-सा गठा हुआ और बलवान है। इसलिए गोविन्द! सूतपुत्र के वध का निश्चय करके शीघ्र प्रस्थान करो।
संजय उवाच