अर्जुनकर्णसंनिपातवर्णनम् / The Convergence of Arjuna and Karṇa
धनंजय! मैं जहाँ-जहाँ भी जाता, कर्णसे भयभीत होनेके कारण सदा उसीको अपने सामने खड़ा देखता था ।। सो*<हं तेनैव वीरेण समरेष्वपलायिना । सहय: सरथ: पार्थ जित्वा जीवन् विसर्जित:,पार्थ! मैं समरभूमिमें कभी पीठ न दिखानेवाले उसी वीर कर्णके द्वारा रथ और घोड़ोंसहित परास्त करके केवल जीवित छोड़ दिया गया हूँ
Yudhiṣṭhira uvāca: Dhanañjaya! so ’haṁ tenaiva vīreṇa samareṣv apalāyinā, sahayaḥ sarathaḥ Pārtha, jitvā jīvan visarjitaḥ.
युधिष्ठिर बोले—“धनंजय! मैं जहाँ-जहाँ भी जाता, कर्ण के भय से सदा उसे ही अपने सामने खड़ा देखता था। पार्थ! उसी वीर ने—जो रण में कभी पीठ नहीं दिखाता—मुझे रथ और घोड़ों सहित परास्त करके भी जीवित छोड़ दिया।”
युधिषछ्िर उवाच