कर्णस्य एकाकि-प्रहारः तथा पाण्डव-महारथ-परिवेष्टनम् | Karṇa’s concentrated assault and the Pāṇḍava encirclement
समीरणस्तांश्व निषेव्य गन्धान् सिषेव सर्वानपि योधमुख्यान् । निषेव्यमाणास्त्वनिलेन योधा: परस्परघ्ना धरणीं निपेतु:
वायु उन सुगन्धों को ग्रहण करके समस्त प्रमुख योद्धाओं की सेवा में लग जाती थी; और उस वायु से सेवित वे योद्धा परस्पर एक-दूसरे को मारकर धराशायी हो जाते थे।
संजय उवाच