Adhyāya 41 — Kṛṣṇa’s Battlefield Briefing and the Renewal of the Great Engagement
हन्यामहं तादृशानां शतानि क्षमाम्यहं क्षमया कालयोगात् | “जो अप्रिय, निष्ठुर, क्षुद्र हृदय और क्षमाशून्य मनुष्य क्षमाशील पुरुषोंकी निन््दा करता है; ऐसे सौ-सौ मनुष्योंका मैं वध कर सकता हूँ; परंतु कालयोगसे क्षमाभावद्वारा मैं यह सब कुछ सह लेता हूँ
hanyām ahaṃ tādṛśānāṃ śatāni kṣamāmy ahaṃ kṣamayā kālayogāt |
संजय ने कहा—ऐसे लोगों के तो मैं सैकड़ों का वध कर सकता हूँ; पर काल-योग के विधान से और क्षमा-धर्म के बल पर मैं सब कुछ सह लेता हूँ। जो अप्रिय, निष्ठुर, क्षुद्र-हृदय और क्षमाशून्य जन क्षमाशील पुरुषों की निंदा करते हैं, उनके प्रति प्रतिकार की शक्ति होते हुए भी मैं समय और परिस्थिति को जानकर संयम धारण करता हूँ।
संजय उवाच