Saṃśaptaka-Varūthinī Saṅgrāma — Binding and Counter-Binding (संशप्तक-वरूथिनी-संग्रामः)
न चेत्तदभिमन्येत पुरुषो<र्जुनदर्शिवान् | शतं दद्यां गवां तस्मै नैत्यिकं कांस्यदोहनम्,“यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उस धनको पर्याप्त न माने तो मैं उसे प्रतिदिन दूध देनेवाली सौ गौएँ और कांसका दुग्धपात्र प्रदान करूँगा
na cettad abhimanyeta puruṣo 'rjunadarśivān | śataṃ dadyāṃ gavāṃ tasmai naityikaṃ kāṃsyadohanam ||
यदि अर्जुन को दिखानेवाला पुरुष उस धन को पर्याप्त न माने, तो मैं उसे प्रतिदिन दूध देनेवाली सौ गौएँ और कांस का दुग्धपात्र दूँगा।
संजय उवाच