Saṃśaptaka-Varūthinī Saṅgrāma — Binding and Counter-Binding (संशप्तक-वरूथिनी-संग्रामः)
तथा प्रद्ष्टे सैन्ये तु प्लवमानं महारथम् | विकत्थमानं च तदा राधेयमरिकर्षणम् | मद्रराज: प्रहस्येदं वचन प्रत्यभाषत
इस प्रकार हर्ष से उल्लसित हुई सेना में जाते और बढ़-चढ़कर बातें बनाते हुए शत्रुसूदन राधापुत्र महारथी कर्ण को देखकर मद्रराज शल्य ने हँसकर इस प्रकार कहा।
संजय उवाच