Karṇa-parva Adhyāya 19 — Saṃśaptaka–Trigarta Assault and Aindra-astra Counter
हतेश्वरो दन्तिवर: सुकल्पित- स्त्वराभिसृष्ट: प्रतिशब्दगो बली । तमाद्रवद् द्रौणिशराहतस्त्वरन् जवेन कृत्वा प्रतिहस्तिगर्जितम्,इतनेहीमें एक सजा-सजाया श्रेष्ठ एवं बलवान् गजराज बड़ी उतावलीके साथ छूटकर प्रतिध्वनिका अनुसरण करता हुआ उधर आ निकला, उसके मालिक और महावत मारे जा चुके थे। अश्वत्थामाके बाणोंसे आहत होकर वह शीघ्रतापूर्वक पाण्ड्ययाजकी ओर दौड़ा। उसने प्रतिपक्षी हाथीकी गर्जनाका शब्द सुनकर बड़े वेगसे उसी ओर धावा किया था
hateśvaro dantivaraḥ sukalpitas tvarābhisṛṣṭaḥ pratiśabda-go balī | tam ādravad drauṇiśarāhatas tvaran javena kṛtvā pratihastigarjitam ||
इतने ही में एक सजा-सजाया, बलवान् श्रेष्ठ गजराज—जिसका स्वामी और महावत मारे जा चुके थे—उतावली में छूटकर प्रतिध्वनि का अनुसरण करता हुआ उधर आ निकला। द्रोणपुत्र के बाणों से आहत होकर वह शीघ्र ही पाण्ड्य की ओर दौड़ा और प्रतिपक्षी हाथी की गर्जना सुनकर बड़े वेग से उसी दिशा में झपट पड़ा।
संजय उवाच