Adhyāya 18 — Sequential Duels and Formation Pressure
Ulūka–Yuyutsu; Śakuni–Sutasoma; Kṛpa–Dhṛṣṭadyumna; Kṛtavarmā–Śikhaṇḍin
पश्येमां नभसस्तुल्यां शरज्नक्षत्रमालिनीम् । “तारागणोंसे जिसकी विचित्र शोभा होती है तथा जहाँ निर्मल चन्द्रमाकी चाँदनी छिटकी रहती है, उस आकाशके समान इस रणभूमिकी शोभाको देखो। जान पड़ता है कि यह शरद-ऋतुके नक्षत्रोंकी मालाओंसे अलंकृत है || ५१ ई ।। एतत् तवैवानुरूपं कर्मार्जुन महाहवे
paśyemāṃ nabhasas-tulyāṃ śaraj-nakṣatra-mālinīm | etat tavaivānurūpaṃ karmārjuna mahāhave ||
संजय बोले—इस रणभूमि की शोभा देखो, जो आकाश के समान है—तारागणों से विचित्र और निर्मल चन्द्र-प्रभा से दीप्त; मानो शरद्-ऋतु के नक्षत्रों की मालाओं से अलंकृत हो। हे अर्जुन! महायुद्ध में यह कर्म तुम्हारे ही अनुरूप है।
संजय उवाच