कर्णपर्व — चतुर्दशोऽध्यायः
Arjuna’s Suppression of the Saṃśaptakas; Kṛṣṇa’s Strategic Admonition; Battlefield Inventory
आदित्याविव संदीप्तौ लोकक्षयकरावुभौ । स्वरश्मिभिरिवान्योन्यं तापयन्तौ शरोत्तमै:
वे दोनों ऐसे दीप्तिमान थे मानो लोकक्षय के लिए उदित हुए दो सूर्य; और जैसे वे अपनी किरणों से परस्पर तपाते हों, वैसे ही वे दोनों वीर अपने उत्तम बाणों से एक-दूसरे को संतप्त कर रहे थे।
संजय उवाच