द्रोणपर्व — अध्याय ८७: सात्यकेरनुयात्रा
Sātyaki’s resolve and departure to reach Arjuna
लोभानुगस्य दुर्बुद्धेः क्रोधेन विकृतात्मन: । राज्यकामस्य मूढस्य रागोपहतचेतस: । दुर्नीतं वा सुनीतं॑ वा तन्ममाचक्ष्व संजय,तात संजय! युद्धमें मेरे मूर्ख पुत्र दुर्योधनके अत्यन्त अन्यायसे एकत्र हुए मेरे अन्य सभी पुत्रोंपर जो कुछ बीता था तथा लोभका अनुसरण करनेवाले, क्रोधसे विकृत चित्तवाले, रागसे दूषित हृदयवाले, राज्यकामी मूढ़ और दुर्बुद्धि दुर्योधनने जो न्याय अथवा अन्याय किया हो, वह सब मुझसे कहो
lobhānugasya durbuddheḥ krodhena vikṛtātmanaḥ | rājyakāmasya mūḍhasya rāgopahatacetasaḥ | durnītaṃ vā sunītaṃ vā tan mamācakṣva sañjaya, tāta sañjaya |
धृतराष्ट्र बोले—हे संजय! लोभ के वशीभूत, दुर्बुद्धि, क्रोध से विकृत चित्त, राग से आहत हृदय, राज्यकामना में मूढ़ दुर्योधन ने जो कुछ किया—वह दुर्नीत था या सुनीत, अधर्म था या धर्म—वह सब मुझे कहो।
धृतराष्ट उवाच