द्रोणपर्व — अध्याय ८७: सात्यकेरनुयात्रा
Sātyaki’s resolve and departure to reach Arjuna
दुःशासनचतुर्थानां नान्यं पश्यामि पठ्चमम् । अथवा दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि तथा चौथे दुःशासनके सिवा मैं पाँचवें किसी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो दिव्यास्त्र प्रकट करनेवाले मेरे इन शत्रुओंका वेग सह सके ।। ४३ $ ।। येषामभीषुहस्त: स्याद् विष्वक्सेनो रथे स्थित:
दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि और चौथे दुःशासन—इनके सिवा मैं पाँचवाँ कोई ऐसा नहीं देखता, जो दिव्यास्त्र प्रकट करने वाले उन शत्रुओं के वेग को सह सके; जिनके रथ पर विष्वक्सेन धनुष-बाण हाथ में लिए स्थित हो।
धृतराष्ट उवाच