Jayadrathasya śoka-bhaya-vilāpaḥ — Droṇena āśvāsanaṃ ca
Jayadratha’s lament and Droṇa’s reassurance
तस्य रोषान्महाराज खेभ्योडग्निरुदतिष्ठत । तेन सर्वा दिशो व्याप्ता: सान्तर्देशा दिधक्षता,महाराज! उस समय क्रोधवश ब्रह्माजीके श्रवण-नेत्र आदि इन्द्रियोंसे अग्नि प्रकट हो गयी। वह अग्नि इस जगत्को दग्ध करनेकी इच्छासे सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओं (कोणों)-में फैल गयी
महाराज! उस समय क्रोधवश ब्रह्माजी के श्रवण-नेत्र आदि इन्द्रियों से अग्नि प्रकट हो उठी। वह इस जगत् को दग्ध करने की इच्छा से समस्त दिशाओं और विदिशाओं (कोणों) में फैल गई।
नारद उवाच