अभिमन्यु-पराक्रमवर्णनम्
Abhimanyu’s Prowess and the Duḥśāsana Engagement
चापमण्डलमेवास्य विस्फुरद् दिक्ष्वदृश्यत । सुदीप्तस्य शरत्काले सवितुर्मण्डलं यथा,जैसे शरद्-ऋतुमें अत्यन्त प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेवका मण्डल दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार अभिमन्युका मण्डलाकार धनुष ही सम्पूर्ण दिशाओंमें उद्भधासित होता दिखायी देता था
उसका धनुष-मण्डल ही चमकता हुआ सब दिशाओं में दिखाई देता था—जैसे शरद्-ऋतु में अत्यन्त दीप्तिमान सूर्य का मण्डल दृष्टिगोचर होता है।
संजय उवाच