Droṇa-parva Adhyāya 37: Sañjaya’s Account of Abhimanyu’s Precision Disruption of a Chariot Contingent
आर्य! तब उन महारथियोंने रथसेनाद्वारा उसे कोष्ठमें आबद्ध-सा करके उसके ऊपर नाना प्रकारके चिह्नवाले समूह-के-समूह बाण बरसाने आरम्भ किये ।। तान्यन्तरिक्षे चिच्छेद पौत्रस्ते निशितै: शरैः । तांश्वैव प्रतिविव्याध तदद्भुतमिवाभवत्,परंतु आपके उस वीर पौत्रने अपने पैने बाणोंद्वारा शत्रुओंके उन सायकसमूहोंको आकाशमें ही काट दिया और उन सभी महारथियोंको घायल भी कर डाला-यह एक अद्भुत-सी बात हुई
sañjaya uvāca | ārya! tadā te mahārathā rathasenayā taṃ koṣṭheṣv iva ābaddhaṃ kṛtvā tasya upari nānā-cihnair yuktān śara-saṃghān saṃghān varṣayām āsuḥ || tāny antarīkṣe ciccheda pautras te niśitaiḥ śaraiḥ | tāṃś caiva prativivyādha tad adbhutam ivābhavat ||
संजय बोले—आर्य! तब उन महारथियों ने रथ-सेनाओं से आपके पौत्र को मानो एक कोष्ठ में बंद-सा कर दिया और उस पर नाना चिह्नों वाले बाणों के समूह-के-समूह बरसाने लगे। पर आपके उस वीर पौत्र ने अपने तीक्ष्ण बाणों से शत्रुओं के उन सायक-समूहों को आकाश में ही काट डाला और उसी क्षण उन महारथियों को भी प्रतिघात करके घायल कर दिया—यह दृश्य अद्भुत-सा प्रतीत हुआ।
संजय उवाच