न पद्भ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुज्चति । शूलाच्छूलसहस्राणि निष्येतुस्तस्य तेजसा,वे अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श नहीं करते थे। त्रिशूल॒को अपने हाथसे अलग कभी नहीं छोड़ते थे। उनके तेजसे उस एक ही त्रिशूलसे सहस्रों नये-नये शूल प्रकट होकर शत्रुओंपर गिरते थे
वे अपने पैरों से पृथ्वी का स्पर्श नहीं करते थे और त्रिशूल को हाथ से कभी नहीं छोड़ते थे। उनके तेज से उसी एक त्रिशूल से सहस्रों शूल निकलकर शत्रुओं पर टूट पड़ते थे।
अजुन उवाच