उमापतिं विरूपाक्ष॑ दक्षयज्ञनिबर्हणम् । प्रजानां पतिमव्यग्रं भूतानां पतिमव्ययम्
umāpatiṃ virūpākṣaṃ dakṣayajñanibarhaṇam | prajānāṃ patim avyagraṃ bhūtānāṃ patim avyayam ||
व्यासजी बोले—उमा-पति विरूपाक्ष, दक्षयज्ञ का विनाश करनेवाले; प्रजाओं के अव्यग्र स्वामी, समस्त भूतों के अविनाशी अधिपति—(उन्हें मैं स्मरण करता हूँ/नमस्कार करता हूँ)।
व्यास उवाच