संजय कहते हैं--राजन्! व्यासजीकी यह बात सुनकर द्रोणपुत्र महारथी अश्वत्थामाने मन-ही-मन भगवान् शंकरको प्रणाम किया और श्रीकृष्णकी भी महत्ता स्वीकार कर ली ।। हृष्टरोमा च वश्यात्मा सो5भिवाद्य महर्षये | वरूथिनीमभिप्रेक्ष्य हुवहारमकारयत्,उसके शरीरमें रोमांच हो आया। उसने विनीतभावसे महर्षिको प्रणाम किया और अपनी सेनाकी ओर देखकर उसे छावनीमें लौटनेकी आज्ञा दे दी
sañjaya uvāca—rājan! vyāsasya vacanaṃ śrutvā droṇaputraḥ mahārathī aśvatthāmā manasā bhagavantaṃ śaṅkaraṃ praṇamya śrīkṛṣṇasya api māhātmyaṃ pratijagrāha. hṛṣṭaromā ca vaśyātmā so ’bhivādya maharṣaye varūthinīm abhiprekṣya huṅkāram akārayat.
संजय बोले—राजन्! व्यासजी की यह बात सुनकर द्रोणपुत्र महारथी अश्वत्थामा ने मन-ही-मन भगवान् शंकर को प्रणाम किया और श्रीकृष्ण की महत्ता भी स्वीकार कर ली। उसके शरीर में रोमांच हो आया; संयमी और विनीत होकर उसने महर्षि को प्रणाम किया। फिर अपनी सेना की ओर देखकर उसने संकेत-नाद करवाया और छावनी में लौटने की आज्ञा दे दी।
संजय उवाच