Droṇa-parva Adhyāya 2: Karṇa’s lament, vow, and battle preparation after Bhīṣma’s fall
>> # रद - कक कपल कक पक क्ान्च ग्प्ष्फ्म्ण्ट्ा *हष्यशे कर के) अर्जुनका जयद्रथके मस्तकको काटकर समन्त-पज्चक क्षेत्रसे बाहर फेंकना व्यासजी अर्जुनको शंकरजीकी महिमा कह रहे हैं भगवान्के द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा हा गोरखपुर युधिष्ठिरकी ललकारपर दुर्योधनका पानीसे बाहर निकल आना आय क अ भीमसेन अश्॒त्थामासे प्राप्त हुई मणि द्रौपदीको दे रहे हैं | त्रिपुर-विनाशके लिये देवताओंद्वारा शंकरजीकी स्तुति श्रीकृष्णद्वारा अर्जुनके अश्वोंकी परिचर्या न त्वेवाहं न गमिष्यामि तेषां मध्ये शूराणां तत्र चाहं ब्रवीमि । मित्रद्रुहो दुर्बलभक्तयो ये पापात्मानो न ममैते सहाया:,“अब ऐसा तो नहीं हो सकता कि मैं उन शूरवीरोंके बीचमें न जाऊँ। इस विषयमें मैं इतना ही कहता हूँ कि जो मित्रद्रोही हों, जिनकी स्वामिभक्ति दुर्बल हो तथा जिनके मनमें पाप भरा हो; ऐसे लोग मेरे साथ न रहें”
na tvevāhaṁ na gamiṣyāmi teṣāṁ madhye śūrāṇāṁ tatra cāhaṁ bravīmi | mitradruho durbalabhaktayo ye pāpātmano na mamaite sahāyāḥ ||
संजय बोले—ऐसा तो नहीं हो सकता कि मैं उन शूरवीरों के बीच न जाऊँ। पर मैं इतना कहता हूँ कि जो मित्रद्रोही हों, जिनकी स्वामिभक्ति दुर्बल हो और जिनके हृदय में पाप भरा हो—ऐसे लोग मेरे सहायक नहीं हैं।
संजय उवाच
True alliance is grounded in dharma: one should reject companionship with those who betray friends, lack steadfast loyalty to their rightful leader, and act from sinful motives. Martial courage alone is not a sufficient basis for trust.
Sañjaya reports a speaker’s resolve to enter the midst of the warriors, while simultaneously drawing a moral boundary: certain unethical persons—friend-betrayers and weakly loyal, sinful men—are disowned as allies.