उद्यम्य त्वरितो बाहुं ब्रुवाणश्व॒ पुनः पुन: । जीवन्तमानयाचार्य मा वधीरिति धर्मवित्,वे धर्मके ज्ञाता हैं, अतः अपनी एक बाँह उठाकर बड़ी उतावलीके साथ बारंबार यह कहने लगे कि “आचार्यको जीते-जी ले आओ, मारो मत”
udyamya tvarito bāhuṁ bruvāṇaś ca punaḥ punaḥ | jīvantam ānayācārya mā vadhīr iti dharmavit ||
धर्मज्ञ कृप ने उतावली से बाँह उठाकर बार-बार कहा—“आचार्य को जीवित पकड़कर ले आओ; उनका वध मत करो।”
कृप उवाच