शिनिप्रवर! कर्णने वैसा ही करनेकी उनके सामने प्रतिज्ञा भी की थी। कर्णके हृदयमें नित्य-निरन्तर गाण्डीवधारी अर्जुनके वधका संकल्प उठता रहता था ।। अहमेव तु राधेयं मोहयामि युधां वर । ततो नावासृजच्छक्ति पाण्डवे श्वेतवाहने,योद्धाओंमें श्रेष्ठ सात्यके! परंतु मैं ही राधापुत्र कर्णको मोहित किये रहता था; इसीलिये ब्ैतवाहन अर्जुनपर उसने वह शक्ति नहीं छोड़ी
śrīvāyudeva uvāca | śinipravara! karṇena vai sā hi karṇikā teṣāṃ samakṣaṃ pratijñāpi kṛtā āsīt | karṇasya hṛdaye nitya-nirantaraṃ gāṇḍīvadhāriṇaḥ arjunasya vadhasaṅkalpaḥ uttiṣṭhati sma || aham eva tu rādheyaṃ mohayāmi yudhāṃ vara | tato na avāsṛjac chaktiṃ pāṇḍave śvetavāhane ||
हे शिनिवंश-श्रेष्ठ! कर्ण ने उनके सामने वैसी ही प्रतिज्ञा की थी। कर्ण के हृदय में गाण्डीवधारी अर्जुन के वध का संकल्प निरन्तर उठता रहता था। परन्तु, हे युद्धवीर-श्रेष्ठ, मैं ही राधेय कर्ण को मोहित किये रहता था; इसी कारण श्वेतवाहन पाण्डव अर्जुन पर उसने वह शक्ति नहीं छोड़ी।
श्रीवायुदेव उवाच