तोरणप्रतिमं शुभ्र॑ किरीटं मूर्थ्यशोभत । वह अपनी छातीपर सुवर्णमय निष्क (पदक) पहनकर अग्निकी माला धारण किये पर्वतके समान प्रतीत होता था। उसके मस्तकपर सोनेका बना हुआ विचित्र उज्ज्वल मुकुट तोरणके समान सुशोभित हो रहा था। उस मुकुटकी विविध अंगोंसे बड़ी शोभा हो रही थी,तल॑ तलेन संहत्य संदश्य दशनच्छदम् । रथमास्थाय च पुनर्मायया निर्मितं तदा उसने उस समय हाथसे हाथ मलकर, दाँतोंसे ओठ चबाकर, पुनः हाथी-जैसे बलवान् एवं पिशाचोंके-से मुखवाले प्रखर गधोंसे जुते हुए मायानिर्मित रथपर बैठकर अपने सारथिसे कहा--“तुम मुझे सूतपुत्र कर्णके पास ले चलो”
sañjaya uvāca | toraṇapratimaṃ śubhraṃ kirīṭaṃ mūrdhny aśobhata | talatalena saṃhatya saṃdaśya daśanacchadam | ratham āsthāya ca punar māyayā nirmitaṃ tadā |
उसके मस्तक पर तोरण के समान उज्ज्वल, विचित्र स्वर्णमय मुकुट शोभा पा रहा था। तब वह हथेलियों को आपस में रगड़कर और दाँतों से ओठ दबाकर, पुनः माया से निर्मित रथ पर आरूढ़ हुआ और अपने सारथी से बोला—“मुझे सूतपुत्र कर्ण के पास ले चलो।”
संजय उवाच