घटोत्कचस्ततो मायां ससर्जान्तर्हित: पुन: । अपने ऊपर प्राप्त हुई उस बाण-वर्षाको कर्णने दूरसे ही काट गिराया। भरतश्रेष्ठ! कर्णके द्वारा अपनी मायाको नष्ट हुई देख घटोत्कचने अदृश्य होकर पुनः दूसरी मायाकी सृष्टि की
ghaṭotkacaḥ tato māyāṃ sasarjāntarhitaḥ punaḥ |
संजय बोले—तब घटोत्कच अदृश्य होकर फिर से माया रचने लगा। कर्ण ने उस पर बरसती बाण-वृष्टि को दूर से ही काटकर गिरा दिया। भरतश्रेष्ठ! अपनी माया को कर्ण द्वारा नष्ट हुआ देखकर घटोत्कच ने छिपकर पुनः दूसरी माया की सृष्टि की।
संजय उवाच