संछिन्दन्तौ च गात्राणि संदधानौ च सायकान्
saṃchindantau ca gātrāṇi saṃdadhānau ca sāyakān
संजय बोले—वे एक-दूसरे के अंग काटते भी थे और फिर बाण चढ़ाते भी थे; यही रण का कठोर क्रम था—आघात के बाद क्षणभर भी विराम नहीं, और तुरंत पुनः प्रहार की तैयारी।
संजय उवाच