रक्तोत्तमाज़: क्रव्यादो गृध्र: परमभीषण: । जैसे महान् पर्वत किसी महामेघसे संयुक्त हो जाय, उसी प्रकार अपने सारथिके साथ बैठे हुए घटोत्कचकी शोभा हो रही थी। उसके रथपर बहुत ऊँची गगन-चुम्बिनी पताका फहरा रही थी, जिसपर एक लाल सिरवाला अत्यन्त भयंकर मांसभोजी गीध दिखायी देता था
रक्तवर्ण शिरोभागवाला, मांसभोजी, अत्यन्त भयंकर गीध—मानो कोई महान् पर्वत किसी महामेघ से संयुक्त हो—उसी प्रकार अपने सारथि के साथ बैठे हुए घटोत्कच की शोभा हो रही थी। उसके रथ पर बहुत ऊँची, गगन-चुम्बिनी पताका फहरा रही थी, जिस पर लाल सिरवाला अत्यन्त भयानक मांसभोजी गीध अंकित था।
संजय उवाच