तमापतत्तं संक्रुद्धं दीप्तास्यं दीप्तमूर्थजम् । प्रहसन् पुरुषव्यात्र: प्रतिजग्राह सूतज:,क्रोधमें भरे हुए उस प्रज्वयलित मुख और चमकीले केशोंवाले राक्षसको आते हुए देख पुरुषसिंह सूतपुत्र कर्णने हँसते हुए उसे अपने प्रतिद्वन्द्दीके रूपमें ग्रहण किया
क्रोध से भरे, प्रज्वलित मुख और चमकते केशों वाले उस राक्षस को अपनी ओर आते देख पुरुषसिंह सूतपुत्र कर्ण ने हँसते हुए उसे प्रतिद्वन्द्वी के रूप में स्वीकार किया।
संजय उवाच