Adhyāya 16: Saṃśaptaka-vrata and the Diversion of Arjuna (द्रोणपर्व, अध्याय १६)
सूर्ये चास्तमनुप्राप्ते तमसा चाभिसंवृते । नाज्ञायत तदा शत्रुर्न सुह्न्न च कश्चन,सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये, सम्पूर्ण जगत् अन्धकारसे व्याप्त हो गया, उस समय न कोई शत्रु पहचाना जाता था न मित्र
sūrye cāstam anuprāpte tamasā cābhisaṃvṛte | nājñāyata tadā śatrur na suhṛn na kaścana ||
जब सूर्य अस्त हो गया और चारों ओर घोर अन्धकार छा गया, तब न कोई शत्रु पहचाना जाता था, न कोई मित्र।
संजय उवाच