वासवी-शक्तेः प्रयोगः, घटोत्कच-वधोत्तर-शोकः, व्यासोपदेशश्च
The Vāsavī Spear’s Use, Post-Ghaṭotkaca Grief, and Vyāsa’s Counsel
शपे<हं कृष्णचरणैरिष्टपूर्तेन चैव ह । यदि त्वां ससुतं पाप॑ं न हन्यां युधि रोषित:,“मैं श्रीकृष्णके चरणों तथा अपने इष्टापूर्तकर्मोकी शपथ खाकर कहता हूँ कि यदि मैं युद्धमें क्ुद्ध होकर तुम-जैसे पापीको पुत्रोंसहित न मार डालूँ तो मुझे उत्तम गति न मिले 'टद्रोणपुत्र!! खड़ा रह, खड़ा रह, तू मेरे हाथसे छूटकर जीवित नहीं जा सकेगा। आज इस रणांगणमें मैं तेरा युद्धका हौसला मिटा दूँगा”
śape ’haṃ kṛṣṇa-caraṇair iṣṭa-pūrtena caiva ha | yadi tvāṃ sa-sutaṃ pāpaṃ na hanyāṃ yudhi roṣitaḥ ||
मैं श्रीकृष्ण के चरणों की और अपने इष्ट-पूर्त के पुण्य की शपथ खाकर कहता हूँ—यदि युद्ध में क्रुद्ध होकर मैं तुम्हें, हे पापी, पुत्रों सहित न मारूँ, तो मुझे उत्तम गति न मिले।
सयजय उवाच