अध्याय १४८ — कर्णप्रभावः, धृष्टद्युम्नस्य विरथता, तथा घटोत्कच-आह्वानम्
Chapter 148: Karṇa’s Pressure, Dhṛṣṭadyumna Unhorsed, and the Summoning of Ghaṭotkaca
शलभा इव ते दीप्तमन्निं प्राप्प ययु: क्षयम् । समरांगणमें अपनेको शूरवीर माननेवाले आपके जो-जो योद्धा अर्जुनके सामने गये, वे जलती आगममें पड़े हुए पतंगोंके समान नष्ट हो गये,पश्चाज्ज्ञातं महीपाल तव पुत्रै: सहानुगै: । वासुदेवप्रयुक्तेयं मायेति नृपसत्तम नृपश्रेष्ठ॒ महीपाल! पीछे सेवकोंसहित आपके पुत्रोंको यह ज्ञात हुआ कि इस अन्धकारके रूपमें भगवान् श्रीकृष्णद्वारा फैलायी हुई माया थी
sañjaya uvāca |
śalabhā iva te dīptam agniṃ prāpya yayuḥ kṣayam |
paścāj jñātaṃ mahīpāla tava putraiḥ sahānugaiḥ |
vāsudeva-prayukteyaṃ māyeti nṛpasattama ||
संजय बोले—जैसे पतंगे जलती हुई अग्नि में जा पड़ते हैं और नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही रणभूमि में अपने को शूरवीर मानने वाले आपके जो-जो योद्धा अर्जुन के सामने गए, वे सब जलती आग में पड़े पतंगों की भाँति विनष्ट हो गए। फिर, हे महीपाल, सेवकों सहित आपके पुत्रों ने जाना—हे नृपश्रेष्ठ—कि यह अंधकार वासुदेव (श्रीकृष्ण) द्वारा प्रवर्तित माया थी।
संजय उवाच