अध्याय १४८ — कर्णप्रभावः, धृष्टद्युम्नस्य विरथता, तथा घटोत्कच-आह्वानम्
Chapter 148: Karṇa’s Pressure, Dhṛṣṭadyumna Unhorsed, and the Summoning of Ghaṭotkaca
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य पुत्रमूर्धनि भूतले । गते तस्यापि शतधा मूर्धागच्छदरिंदम,शत्रुदमन महाराज! पुत्रका मस्तक पृथ्वीपर गिरते ही राजा वृद्धक्षत्रके मस्तकके भी सौ टुकड़े हो गये
tatas tasya narendrasya putramūrdhani bhūtale | gate tasyāpi śatadhā mūrdhāgacchad arindamaśatrudamana mahārāja ||
संजय बोले—शत्रुदमन महाराज! उस नरेन्द्र के पुत्र का मस्तक जैसे ही भूमि पर गिरा, वैसे ही राजा वृद्धक्षत्र का सिर भी सौ टुकड़ों में फट गया।
संजय उवाच