Śalya–Bhīma Gadāyuddham (मद्रराज-भीमसेन गदायुद्धम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें अर्जुनके द्वारा युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ,उत्तमाजैः पड़कजिनी निस्त्रिंशझषसंकुलाम् । रथनागह्दोपेतां नानाभरणभूषिताम् योद्धओंके कटे हुए मस्तक कमल-पुष्पके समान जान पड़ते थे, जिनके कारण वह कमलवनसे सम्पन्न दिखायी देती थी। उसके भीतर असंख्य डूबती-बहती तलवारोंके कारण वह नदी मछलियोंसे भरी हुई-सी जान पड़ती थी। रथ और हाथियोंसे यत्र-तत्र घिरकर वह नदी गहरे कुण्डके रूपमें परिणत हो गयी थी। वह भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित-सी प्रतीत होती थी
sañjaya uvāca | uttamaujaiḥ padmakajīnīṃ nistriṃśa-jhaṣa-saṅkulām | ratha-nāga-hrada-upetāṃ nānābharaṇa-bhūṣitām |
संजय बोले—रणभूमि की वह रक्त-धारा मानो कमल-ह्रद बन गई थी; क्योंकि योद्धाओं के कटे हुए मस्तक कमल-पुष्पों के समान दीखते थे। असंख्य तलवारें डूबती-बहती उसमें ऐसी जान पड़ती थीं मानो मछलियाँ भर गई हों। जहाँ-तहाँ रथों और हाथियों से घिरकर वह नदी गहरे कुंडों-सी हो गई; और चारों ओर बिखरे आभूषणों के कारण वह नाना प्रकार के रत्नों से सजी हुई-सी प्रतीत होती थी।
संजय उवाच