ततः पुनर्व्यात्तमुखास्ते5श्मवृष्टी: समनन््ततः । अयोहस्ता: शूलहस्ता दरदास्तड्रणा: खसा:,तदनन्तर पुनः हाथमें लोहेके गोले और त्रिशूल लिये मुँह फैलाये हुए दरद, तंगण, खस, लम्पाक और कुलिन्ददेशीय म्लेच्छोंने सात्यकिपर चारों ओरसे पत्थर बरसाने आरम्भ किये; परंतु प्रतीकार करनेमें निपुण सात्यकिने अपने नाराचोंद्वारा उन सबको छिज्न-भिन्न कर दिया
tataḥ punar vyāttamukhās te ’śmavṛṣṭīḥ samanantataḥ | ayohastāḥ śūlahastā daradās taṅgaṇāḥ khasāḥ |
तदनन्तर, क्रोध से मुँह फैलाए वे दरद, तंगण और खस—हाथों में लोहे के गदा-गोल और त्रिशूल लिए—चारों ओर से सात्यकि पर पत्थरों की वर्षा करने लगे।
संजय उवाच