Droṇa-parva Adhyāya 114 — Karṇa–Bhīmasena Missile Exchange, Disarmament, and Arjuna’s Intervention
द्विगुणीकृततेजा हि प्रज्वलन्निव पावक: । उत्सड्गे धनुरादाय सशरं रथिनां वर:,ब्राह्मणोंके आशीर्वाद पाकर तेजस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं मधुपर्कके अधिकारी सात्यकिने कैलातक नामक मधुका पान किया। उसे पीते ही उनकी आँखें लाल हो गयीं। मदसे नेत्र चंचल हो उठे, फिर उन्होंने अत्यन्त हर्षमें भरकर वीरकांस्यपात्रका स्पर्श किया। उस समय प्रज्वलित अग्निके समान रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकिका तेज दूना हो गया। उन्होंने बाणसहित धनुषको गोदमें लेकर ब्राह्मणोंके मुखसे स्वस्तिवाचनका कार्य सम्पन्न कराकर कवच एवं आभूषण धारण किये, फिर कुमारी कन्याओंने लावा, गन्ध तथा पुष्पमालाओंसे उनका पूजन एवं अभिनन्दन किया
dviguṇīkṛta-tejā hi prajvalann iva pāvakaḥ | utsaṅge dhanur ādāya saśaraṃ rathināṃ varaḥ ||
रथियों में श्रेष्ठ सात्यकि का तेज मानो प्रज्वलित अग्नि के समान दुगुना हो गया। उन्होंने बाणसहित धनुष को गोद में लेकर धारण किया।
संजय उवाच