द्रोणपर्व (अध्याय ११२) — कर्णभीमयोर्युद्धम्, दुर्योधनस्य रक्षणादेशः
Droṇa-parva 112: Karṇa–Bhīma Engagement and Duryodhana’s Protective Order
भीरूणामसतां मार्गो नैष दाशार्हसेवित: । शैनेय! दशार्हकुलके वीर पुरुष रणक्षेत्रमें अपने प्राण बचानेकी चेष्टा नहीं करते हैं। युद्धसे मुँह मोड़ना, युद्धस्थलमें डटे न रहना और संग्रामभूमिमें पीठ दिखाकर भागना यह कायरों और अधम पुरुषोंका मार्ग है। दशाकुलके वीर पुरुष इससे दूर रहते हैं || ९८ ई ।। तवार्जुनो गुरुस्तात धर्मात्मा शिनिपुज्रव
bhīrūṇām asatāṁ mārgo naiṣa dāśārha-sevitaḥ | śaineya daśārha-kulake vīrāḥ puruṣā raṇa-kṣetre prāṇān rakṣituṁ na ceṣṭante | yuddhāt mukhaṁ moḍayitum, yuddha-sthale na sthātum, saṅgrāma-bhūmau pṛṣṭhaṁ darśayitvā palāyitum—eṣa bhīrūṇām adhamānāṁ ca mārgaḥ | daśārha-kulasya vīrāḥ etasmāt dūrataḥ tiṣṭhanti ||
युधिष्ठिर बोले—यह कायरों और अधम पुरुषों का मार्ग है; दाशार्ह इसे नहीं अपनाते। हे शैनेय, दाशार्हकुल के वीर रणक्षेत्र में प्राण बचाने की चेष्टा नहीं करते। युद्ध से मुँह मोड़ना, युद्धस्थल में डटे न रहना और संग्रामभूमि में पीठ दिखाकर भागना—यह भीरुओं का पथ है; दाशार्ह वीर इससे दूर रहते हैं।
युधिष्ठिर उवाच