अध्याय ८० — मध्यंदिन-रणवृत्तान्तः
Yudhiṣṭhira–Śrutāyu encounter; Cekitāna–Gautama clash; Abhimanyu pressure; Arjuna’s redeployment
संजय कहते हैं--राजन! आपने अपने ही दोषसे यह संकट प्राप्त किया है। भरतश्रेष्ठ) जिन धर्म और अधर्मके सम्मिश्रणसे उत्पन्न दोषोंको आप देखते थे, उन्हें दुर्योधन नहीं देख सका था। प्रजानाथ! आपके अपराधसे ही पहले द्यूतक्रीड़ाकी घटना घटी थी ।। तव दोषेण युद्ध च प्रवृत्तं सह पाण्डवै: । त्वमेवाद्य फलं भुड्क्षे कृत्वा किल्बिषमात्मना,तथा आपके ही दोषसे आज पाण्डवोंके साथ युद्ध आरम्भ हुआ। आपने स्वयं ही जो पाप किया है, उसका फल आज आप ही भोग रहे हैं
sañjaya uvāca—rājan! āpena svadoṣeṇaiva idaṁ saṅkaṭaṁ prāptam. bharataśreṣṭha! ye dharma-adharma-sammīśraṇāt utpannān doṣān tvaṁ paśyasi, tān duryodhano na paśyati sma. prajānātha! tava aparādhenāiva pūrvaṁ dyūtakrīḍāyāḥ ghaṭanā abhavat. tava doṣeṇa yuddhaṁ ca pravṛttaṁ saha pāṇḍavaiḥ. tvam evādya phalaṁ bhuṅkṣe kṛtvā kilbiṣam ātmanā.
संजय बोले—राजन्! अपने ही दोष से आप ऐसी विपत्ति को प्राप्त हुए हैं। भरतश्रेष्ठ! धर्म और अधर्म के सम्मिश्रण से उत्पन्न जो दोष अब आपको दिखाई दे रहे हैं, उन्हें दुर्योधन नहीं देख सका। प्रजानाथ! आपके अपराध से ही पहले द्यूतक्रीड़ा की घटना घटी थी। और आपके ही दोष से आज पाण्डवों के साथ यह युद्ध प्रवृत्त हुआ है। आपने अपने ही हाथों जो पाप किया, उसका फल आज आप ही भोग रहे हैं।
संजय उवाच