भीष्मपर्व — अध्याय 54: फल्गुन-प्रतिरोधः, सौबली-व्यूह-विध्वंसः, दुर्योधन-भीष्म-संवादः
मत्कते भ्रातृहार्देन राज्याद् भ्रष्टास्तथा सुखात् | जीवितं बहु मन्ये5हं जीवित हाद्य दुर्लभम्
मेरे कारण भ्रातृ-स्नेह से बँधे हुए ये लोग राज्य और सुख से वंचित होकर दुःख भोग रहे हैं। इस समय मैं इनके और अपने जीवन को ही श्रेष्ठ मानता हूँ, क्योंकि आज जीवन भी दुर्लभ हो गया है।
संजय उवाच