Arjuna–Bhīṣma Strategic Engagement and Mutual Arrow-Interdiction (भीष्मार्जुनसमागमः)
विविंशतिकश्षित्रसेनो विकर्णश्र महारथ: । पुरुमित्रो जयो भोज: सौमदत्तिश्न वीर्यवान्,(अग्रतः पाण्डुसेनाया हाृतिष्ठन् पृथिवीक्षित: ।।
sañjaya uvāca |
viviṁśatir citraseno vikarṇaś ca mahārathaḥ |
purumitro jayo bhojaḥ saumadattiś ca vīryavān |
(agrataḥ pāṇḍu-senāyā hṛtiṣṭhan pṛthivīkṣitaḥ ||)
संजय बोले—विविंशति, चित्रसेन, महारथी विकर्ण, पुरुमित्र, जय, भोज और सोमदत्त-पुत्र पराक्रमी भूरिश्रवा—ये सब राजा पाण्डव-सेना के अग्रभाग में डट गये। वे अपने महाधनुषों को कँपाते हुए और ऐसे बाण हाथ में लेते हुए जो छूटते ही विषधर सर्प-से प्रतीत होते थे, बिजली से युक्त मेघों के समान दीखते थे; और पाण्डवों के सम्मुख एक दुर्जेय आवरण-सा बनाकर खड़े हो गये।
संजय उवाच