विभूति-योगः (Vibhūti-yoga) — Exemplary Manifestations as a Contemplative Index
अनन्यचेता:* सतत यो मां स्मरति नित्यश: । तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्थ योगिन:
हे पार्थ! जो योगी अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर सदा मुझ पुरुषोत्तम का स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिये मैं सुलभ हूँ—अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।
अजुन उवाच